rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« on: September 22, 2007, 04:14:29 PM » |
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तुम ही हो अपने जीवन के शिल्पकार --- यह दिव्य संदेश देने वाले सदगुरु के चरणों मे मेरा सादर प्रणाम एक यक्ष प्रश्न जिसका मुझे बार बार सामना करना पड़ रहा हे वह हे "मेने जीवन विद्या क्यों अपनाई" इस यक्ष प्रश्न का उत्तर देना आसान नही हे एक लाईन या एक वाक्य में इतनी व्यापक विचारों पर आधारित सम्पूर्ण विश्व के केवल मानव ही नही सम्पूर्ण प्राणिमात्र ही नही अपितु इस प्रकृति मे निहित सम्पूर्ण चेतन - अचेतन जगत के कल्याण की विचार धारा समाविष्ट हो "-- का उत्तर असंभव हे में प्रयास कर रहा हू अपना पक्ष रखने का कि मेने जीवन विद्या क्यों अपनाई जीवन विद्या क्यों ----- मे एक साधारण व्यक्ति हू सामान्य व्यक्तियों के समान ही मेरी भी परमार्थ आध्यात्म या धर्म के बारे मे विचारधारा थी मन मे समाहित ये विचारधाराये समय काल या परिस्थिति अनुसार बदलती रही एक बkट अवश्य थी कि अंध-श्रद्धा कि परिभाषा जो मेरी विचार धारा अनुसार थी उसके अनुसार मेने हमेशा यह प्रयास किया कि कोई भी कार्य अंध श्रद्धा मे नही करना हे नित्य पूजा पाठ के अतिरिक्त स्तोत्र या धार्मिक पुस्तके जेसे गुरुचरित्र या रामायण आदी का वाचन करता रहता हूँ प्रारम्भ मे मुझे हनुमान चालीसा रामरक्षा स्तोत्र को प्रतिदिन पड़ने कि आदत लगी उसके बाद दत्तजयंती पर गुरुचरित्र पाठ शनिवार को सुन्दरकाण्ड चतुर्थी को अथर्वशीर्ष पाठमाह मे एक बार सत्यनारायण आदि का अनुसरण करने लगा . व्यक्तिगत कारनोवश परिस्थिति अनुसार मुझे गुरुचरित्र पाठ व प्रतिदिन रामरक्षा स्तोत्र के प्रभाव का अनुभव हुआ मेरी माँ के आशीर्वाद स्वरूप मुझे कभि कोई एसा कष्ट नही हुआ जिससे मे अत्यधिक पूजा पाठ मे संलग्न होता परंतु रुझान अवश्य था मेरी माँ हमेशा मेरे पास ही रही आवश्यक दिनचर्या के बाद हमेशा रामनाम का जाप निरंतर करती रहती थी --उसका प्रभाव भी मेने महसूस किया गत ८-१० वर्ष पूर्व किसी न किसी कारन से यथा --ज्योतिषी के कहे अनुसार या मन्दिर के किसी महंत के अनुसार या अन्य के अनुसार मंदिरों के दर्शन करना बढता गया --सोमवार को महादेव मन्दिर मंगलवkर को हनुमान मन्दिर बुधवार को नाग मन्दिर गुरुवार को दत्त मन्दिर शुक्रवार को देवी का वार अत: कुलदेवी कि घर पर पूजा शनिवार को नवग्रह मन्दिर आदी आदी कभी मेरा कार्य या मेरी इच्छा पूरि होती तो मन मे विचार आते कि यह मंगलवार के कारन हुआ या शुक्रवार के बुधवार के कारन हुआ या गुरुवार के इसी प्रकार यदि कोई कष्ट हुआ या इच्छित कार्य नही हुआ तो मन मे यह विचार कर यह समझने का प्रयास किया कि एसा क्या नही किया जिसका मुझे बुरा परिणाम मिला इन्ही विचारो मे उलझा रहता धर्म या आध्यात्मिक लोगों से चर्चा करता रहता विभ्हिन विचार धाराओं वाली संस्थाओं कि पुस्तकें पड़ना प्रारम्भ किया जब जहाँ जेसा मौका मिला वेसे समझने का प्रयास करने लगा और धीरे धीरे मन में यह विचार आया कि श्रेष्ठ क्या इसी प्रयास मे लग गया इसी प्रकार यदि कोई कष्ट हुआ या इच्छित कार्य नही हुआ तो मन मे यह विचार कर यह समझने का प्रयास किया कि एसा क्या नही किया जिसका मुझे बुरा परिणाम मिला इन्ही विचारो मे उलझा रहता धर्म या आध्यात्मिक लोगों से चर्चा करता रहता विभ्हिन विचार धkराओं वाली संस्थाओं कि पुस्तकें पड़ना प्रारम्भ किया जब जहाँ जेसा मौका मिला वेसे समझने का प्रयास करने लगा और धीरे धीरे मन में यह विचkर आया कि श्रेष्ठ क्या इसी प्रयास मे लग गया के कारन हुआ या गुरुवार के इसी प्रकार यदि कोई कष्ट हुआ या इच्छित क्रkय नही हुआ तो मन मे यह विचार कर यह समझने का प्रयास किया कि एसा क्या नही किया जिसका मुझे बुरा परिणाम मिला इन्ही विचारो मे उलझा रहता धर्म या आध्यात्मिक लोगों से चर्चा करता रहता विभ्हिन विचार धkराओं वाली संस्थाओं कि पुस्तकें पड़ना प्रारम्भ किया जब जहाँ जेसा मौका मिला वेसे समझने का प्रयास करने लगा और धीरे धीरे मन में यह विचkर आया कि श्रेष्ठ क्या इसी प्रयास मे लग गया इसी तारतम्य मे एक बार मे डाक्टरजुवेकर जी के निवास पर गया वहांपर सनातनधर्म के स्वयंसेवकों से चर्चा करने का अवसर मिला चर्चा मे एक बात यह समझ मे आई मनुष्य के जीवन मे आध्यात्मिक गुरू आवश्यक हे परंतु स्वयं कही भी जाकर या किसी को गुरू नही बनाना चाहिए आप तो स्वयं को तयार करें एक आदर्श शिष्य बनने हेतु आपकी मन कि इच्छा या विचारधारा का व गुरू कि विचार धारा का जहाँ मिलाप होगा गुरू स्वयं तुम्हे खोज लेगा और वह तुम्हे अपना शिष्य बनालेगा यह देव योग हे --जब तक यह योग नही आयेगा तब तक प्रयास करो अपनी योग्यता बढाने का यही बात मेरे मन में घर कर गई तभी से मन में इस विचार ने जन्म लिया कि गुरू के शिष्य बनने लायक स्वयं को तयार करो हो सकता हे इस तयारी में जन्म निकल जाए या तुरंत गुरू मिल जायें इसी दिन एक और बात समझ मेआई अपनी कुल देवी या देवता का स्मरण करो --वही तुम्हारी फेमेली डॉक्टर हे जो भी प्रार्थना करना हे उसी के सम्मुख करो इसी भावना के तहत मेरा मन्दिर मन्दिर भटकना बंद हुआ केवल घर पर ही अपनी कुलदेवी से सम्बन्धित स्तोत्र आदि का वाचन प्रारम्भ हुआ कुछ समय बाद फिर वही पुरानी बातों कि और ध्यान गया पर अधिक नही स्वयं कि तयारी में गायत्री परिवार आशारामबापू इस्कान आदी कि कुछ पुस्तकें पड़ी इसी विचारों के मध्य जुवेकर जी के निवास पर सदगुरु गोंद्व्लेकर महाराज के शिष्य सदगुरु दत्ता भईया महाराज के विचारों को जानने का अवसर मिला इसके बाद यह ग्यात हुआ की मेरी माँ के गुरू श्री राम महाराज और दत्ताभईया महाराज गुरू भाई हे अत: मेरा रुझान भी इसी के विचारधारा की और हुआ और मुझे लगने लगा की मेरी तयारी हो गई व अब मुझे गुरू मिल जायेगे एक बार सदगुरु दत्ता भइयामहाराज ग्वालियर भी आए लोगो ने अनुग्रह भी लिया पर किन्ही कारणों वश मैं रह गया मेरे मन मे विचार आया की शायद मेरी तयारी मैं कमी हे इसलिए मुझे गुरू नही मिल पाए कुछ समय प्रयासरत रहने की और आवश्यकता महसूस की, परन्तु दुर्भाग्य से इसी मध्य मेरी माँकादेहावसान हो गया.इसके बद जब भी मुझे बेचेनी महसूस होती में जुवेकर जी के यहाँ जाताउनसे चर्चा करता उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत शान्ति मिलती. एक दिन शाम को में जुवेकर जी के घर गया मेरी पत्नी भी साथ थी ,चर्चा के बद जब में उठ रहा था तभी जुवेकर जी बोले आप एक कार्य कर सकते हें क्या ग्वालियर मे हम सभी सदगुरु शिष्यों ने कुछ संकल्प लिया हे आप उस मे सहयोग कर सकते हे १० माला या जितनी भी माला का जप समय अनुसार "श्री राम जय राम जय जय राम" का जाप घर पर करे ! उन्होंने मुझे व मेरी पत्नी को एक माला दी मेने सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि मेरे मन में एकदम यह भावना आई की मुझे गुरू मिल गए माला दी, मंत्र दिया व आध्यात्मिक ज्ञान भी दिया. इस तरह कुछ समय श्री राम जय राम जय जय राम न!म का जप करते करते मन मैं यह विचार ने जन्म लिया कि इश्वर स्मरण से स्वयंको तो लाभ मिलेगा पर यदि हम दूसरो के भले हेतु ईश्वर से प्रार्थना करे तो शायद हमे इसका फल जल्दी मिले व दुसरे भी लाभान्वित होंगे इसी विचार धारा के फल स्वरूप जप करने से पहले "सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे संतु निरामया "वाक्य का स्मरण कर जप करने लगा कुछ समय बादइसका अच्छा अनुभव हुआ अत: यह सोचा क्यों न इस विचार से अन्य को भी अवगत करूं और उन्हें भी इस तरह जाप करने हेतु प्रेरित करूं इसी प्रयास मैं मेने एक संस्था बनानेका निश्चय किया और कुछ विचारों को अपनाया १- सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया " वाक्य को ईश्वरीयप्रार्थना से पहले स्मरण करना २-- ईश्वरीय स्मरण हेतु नामस्मरण "श्री राम जय राम जय जय राम"का जप करना ३-- आधाय्त्म कि और आकर्षित करने हेतु संघे शक्ति कलयुगेवाक्य के साथ एक मलटीलेबल मार्केटिंग आर.सी.एम्.को अपनाकर आर्थिक लाभ पहुचाना और इस तरह एक संस्था "श्री राम परिवार "के नाम से स्थापित की श्री राम परिवार के स्थापना दिवस पर मैंने घर पर १३ घंटे के अखंड जाप का आयोजन किया. श्री जुवेकर जी को अपने विचारो से अवगत करा उनके आशीर्वाद प्राप्त किए. १३ घंटे के अखंड जाप हेतु श्री जुवेकर जी ने समझाया कि स्वयं १३ घंटे अकेले मत बैठो. एक आसन निश्चित कर, बदल बदल कर बैठेंगे व अन्य सभी समय अनुसार अपना जाप करेंगे. परन्तु मेरे मन मे ये था कि मेरे द्वारा ही १३ घंटे का जाप हो तभी मेरी संकल्प शक्ति को बल मिलेगा व दूसरो कि भलाई का मार्ग प्रशस्त करने हेतु ,मैं स्वयं को तैयार कर सकूँगा, क्योकि मैं जब कुछ करुंगा तब तो अन्य से कुछ करने हेतु कह सकूँगा. सुबह ६ बजे से शाम ७ बजे तक जाप हुआ, मैं बैठा रहा, किसी भी तरह का कष्ट मुझे नही हुआ. उस दिन क़रीब १०० - १५० लोगो ने समय अनुसार आ कर जाप किया, उन्हें शांति पूर्वक बैठकर जाप करने कि प्रथा बोहोत पसंद आयी, उनकी इसी पसंद अनुसार मुझे भी अपनी विचार धारा बढ़ाने का अवसर मिलने लगा व मैं श्री राम परिवार के सदस्य को एक माला व श्री राका फोटो देता व RCM के प्रोडक्ट को क्रय करने हेतु निवेदन करता. समय अनुसार डा. जुवेकर जी से चर्चा करता. इसी चर्चा मे एक दिन जुवेकर जी ने समझाते हुए बताया कि श्री राम शब्द का अर्थ धनुषबाण हाथ मे लिए राम ही नही अपितु यह एक्व्यापक शब्द है इसे परमेश्वर रूप मे देखे. यह बात मेरे मन मे समां गई. वाकई मे यह व्यापक शब्द है अतः मैंने श्री राम परिवार के अंतर्गत कुछ संशोधन किया वह यह कि जिसे जिस इष्ट देव कि प्रार्थना करने से शांति प्राप्त होती है वह उसी इष्ट देव के नाम जाप करे. इस विचार से श्री राम परिवार का क्षेत्र भी व्यापक हुआ, जाति धर्म का बन्धन भी समाप्त हुआ. इसका अनुभव भी मुझे हुआ, मेरे शुभ चिताको मे कई धर्म व जाति के लोग थे अतः उनका समर्थन भी मुझे मिला. इस सब के बावजूद यह काम इतना आसान नही था. इस कार्य हेतु बहुत तपस्या कि ज़रूरत थी, साथ मे परिवार कि ज़िम्मेदारी ,शासकीय कार्य कि ज़िम्मेदारी, सामाजिक संस्थाओं से जुदा होने के कारण उनकी ज़िम्मेदारी, इसके बाद श्री राम परिवार के कार्य. अतः गति बहुत धीमी रही पर जो भी सदस्य बने वह पूर्ण रुपें विचार धारा को समर्पित रहे, आज भी है. इस प्रकार के कार्य प्रारम्भ रहते एक बार सौभाग्य से इन्दौर मध्य प्रदेश मे सदगुरू भैयु महाराज के विचारो को जानने का अवसर मिला अन्य बातो के साथ वहा मैंने देश के प्रति आस्था का आध्यात्मिक क्षेत्र मे प्रभाव को महसूस किया. देश प्रेम या देश प्रेम भक्ती कि भावना को आध्यात्म द्वारा प्रचारित करना मन को छू गया. इस समय तक मेरी देश भक्ती कि भावना अनुसार यही विचार धारा थी कि मेरे पास जो शासकीय कार्य है उसे ही मैं इमान दारी से करु यही सच्ची देश भक्ती है, यही देश सेवा है. मेरी पुत्र वधु सौ कामना उनसे प्रभावित थी और वह मुझे उनके कार्यो व विचारो से अवगत कराती रहती थी, फिर एक बार मुझे लगा कि मेरियो तैयारी पूर्ण हुई और मैं किसी का शिष्य बन्ने लायक हो गया हु पर योग नही था. गुरू पूर्णिमा को सभी तैयारी होने के बावजूद मैं इन्दौर नही जा पाया. फिर एक बार मैंने विचार किया कि मेरी तैयारी मे कमी रह गई है और मैं नाम स्मरण करता रहा. ५ अगस्त २००७, रविवार का वह दिन, समय लगभग १ बजे दोपहर का था. इस समय सदगुरू श्री वामन राव पै के शिष्य मेरे सदगुरू स्वरूप श्री प्रभाकर नारकर जी व श्री अशोक कडू जी मेरे घर पर प्रकट हुए और उन्होंने जीवन विया कि विचार धारा से अवगत कराया. मैं उन्हें अधिक समय तो नही दे पाया फिर भी कुछ परिचितों के घर ले गया. जब वो मुझसे विदा ले रहे थे, आटो मे बैठने को थे मुझे ना जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि इनसे मेरा कोई नाता है व मन को उन्हें विदा करते हुए बुरा भी लग रहा था. जाते वक्त जिन आशिर्वचानो का प्रयोग, नारकर जी व कडू जी ने जिस भावना से किया वह इतना मन को छू गया कि मैं कुछ कह नही सकता. इसकी बाद मैं दुसरे दिन मैं मेले कि जीवन विद्या स्टाल पर पहुचा. श्री संतोष सावंत जी से मुलाक़ात हुई और बस एक प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई. वह ७ दिन, ५ से११ अगस्त तक, मुझे हमेशा याद रहेंगे. मैंने अपने घर, दिनांक ११ अगस्त ०७ को कार्यक्रम का आयोजन कर सभी को आमंत्रित किया. अपने परिचितों को जीवन विद्या विचारधारा जाने हेतु आमंत्रित किया. इसी मध्य मुझे पूर्ण रूपं विश्वास होने लगा कि अब मेरी परीक्षा कि घड़ी आ गयी है. जो मैं इतने सालो से स्वयं को तैयार करने का अभ्यास कर रहा था. शिष्य बनाने हेतु सदगुरू ने परीक्षा लेने संतोष सावंत जी को मेरे पास भेजा अतः दिनांक ११ अगस्त ०७ की परीक्षा मे मुझे पास होना ही था.यही मेरे जीवन का स्वर्णिम अवसर था कि मैं अपने गुरू को प्राप्त कर सकू अतः मैंने अधिक से अधिक समय सदगुरू के नवरत्नों के सानिध्य मे रह कर व्यतीत करने का निश्चय किया और उसका लाभ मिला. ११ अगस्त को श्री संतोष सावंत जी ने मुझे सदगुरू दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु निमंत्रित किया.उनके निमंत्रण पर मैं अति आनंदित हुआ और मईजीवन विद्या क विचारो के प्रचार प्रसार हेतु श्री सावंत जी से स्वीकृति हेतु प्रार्थना की और सावंत जी ने तुरंत स्वीकार कर लिया. इस प्रकार मुझे लगा की मेरे मन मे जो गुरू प्राप्ति हेतु स्वयं को तैयार करने की जो विचार धरा थी वह एक दम सत्य निकली. मुम्बई मे सदगुरू श्री वामन राव पै, मैं ग्वालियर - इससे पूर्व जीवन विद्या या सदगुरू के विचारो को जानने का अवसर नही मिला था और नाही मैं ग्वालियर पधारे सदगुरू के नवरत्नों से पूर्व परिचित था. मुझे जो आत्मविश्वास था कि स्वयं को तैयार करना है, इस लायक बनना है कि मुझे अपना शिष्य बनाने मे गुरू को परेशानी ना हो और जब मैं इस लायक हो जाऊंगा गुरू मुझे खोज निकालेंगे. यह एक सत्य घटना है, वर्तमान युग मे भी इस तरह कि घटना घट सकती है इस बात का अन्य को विश्वास नही होगा पर यह एक नितांत सत्य घटना है और सदगुरू जी ने मुझे अनुग्रह हेतु मुम्बई बुला ही लिया, मí
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rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« Reply #1 on: September 22, 2007, 04:16:40 PM » |
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.....continued
मेरे जीवन कि यह बहुत बड़ी घटना है. अब आप स्वयं सोचे कि मैंने जीवन विद्या क्यो अपनाई. "जावन विद्या मे सम्पूर्णता है ऐसी कोई भी बात इस जीवन विद्या मे छूटी नही है जो आपके दिल के किसी कोने मे पड़ी भावना को छू ना सके अर्थात एक शब्द मे - सब का मालिक एक" इसके पश्चात भी यदि आपको इस सत्य घटना पर या जीवन विद्या पर विश्वास नही तो मुझे जीवन विद्या की ही एक शिक्षा दोहरानी है - "तुम्हे शक है तो खुदा को खोजो, मंदिरों या मस्जिद मे, चर्च या गुरुद्वारों मे, मुझे तो आप सब मे खुदा दिखते है."
इति शुभम, सदगुरू के आशिर्वादो का आकांक्षी राकेश महाशब्दे
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subhash
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« Reply #2 on: September 23, 2007, 10:07:01 AM » |
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Dear Rakesh-jee,
welcome to Jeevanvidya mission. Hope you follow english posts on this site. Do you know Marathi language by any chance? We do know hindi language but just little time consuming to type in Hindi. Otherwise we will do it as well.
Please read the other posts on this forum and if you have any queries let's know and we will attempt to answer. If we are not able to answer we can ask Satguru-ji.
God bless you, Subhash
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God bless you, God bless all.
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Deepak_jvm
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« Reply #3 on: September 23, 2007, 09:20:42 PM » |
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Dear Rakesh-jee, Welcome to Jeevanvidya. Thank you for sharing your experience with all of us. We are happy that finally you got Satguru. Satguru's blessings are always with the people like you.
However, I would like to clarify one thing for the benefit of others who may be waiting for Satguru to approach them to make his disciple. Disciple should find out Satguru and get his blessing. It is not recommended to wait until Satguru comes to your home and makes you disciple. If one misses an opportunity to get Satguru in the current life span, no one can guarantee that it will surely happen in the next birth.There is no guarantee that the next birth will be human only. You must be aware of the story of rishi "Jadbharat" who couldn't get the next birth of human being.
May God bless all with "Satguru yachi dehi yachi dola".
Deepak
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rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« Reply #4 on: September 24, 2007, 12:51:40 AM » |
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आदरणीय दीपक जी -- नमस्कार धन्यवाद् . आपके विचार जानकर अच्छा लगा पर एक प्रश्न मन में आरहा हे कि क्या गुरू पाने हेतु हमारे विचारों का कोई महत्व नही .उदहारण स्वरूप यदि मैं आर्ट का विद्यार्थी हूँ तो मुझे आर्ट का ही गुरू चाहिए अन्य विषय के गुरू के समक्ष शिक्षा हेतु जाऊंगा तो वह मेरे विषय कि जानकारी तो लेंगे ही यदि नही लेते और अपने विषय कि शिक्षा देंगे तो मेरे किस काम की . मेरा गुरू खोज लेने से तात्पर्य केवल इतना ही हे कि पहले हमे भी ये समझना होगा कि एक स्तर के बाद किस विषय कि शिक्षा लेनी हे और जब आपका विषय स्पष्ट होगा तो आपके चयनित विषय के गुरू आपको अपनी और आकर्षित करेंगे . मेरा एसा माननाहे कि गुरू गोविन्द से बड़े हे और एक सच्चे गुरू के पास एसी दिव्य शक्ति होती हे कि वह अपने विषय से सम्बंधित शिष्य को अपनी और आकर्षित कर लें . .बिना अपने विचारों में परिपक्वता लाये कोई भी गुरू करने से न तो आप गुरू कि दी सच्ची शिक्षा ग्रहन कर पाओगे और ऐसी हालत में गुरू प्राप्त करने का भी कोई अर्थ नही रह जाएगा गुरू प्राप्ति में हमारे प्रारब्ध का भी योगदान होता हे .कृपया मार्ग दर्शन करें
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dr.nutanpol
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« Reply #5 on: September 24, 2007, 12:13:16 PM » |
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Rakeshji,
Namaskaar,
Shri. Sadguru aaplyala aaplya vicharapramanech milale aahet ani tyamule aaplyala atishay aanand zala aahe. Hya aanandaat amhala sahabhagi karun ghetlya baddal dhanyavad. Aaplyala zalela aanand pahun amhalahi atishay aanand zala aahe. Shri. Satguruncha mi hi khup shodh ghet hote ani jevha 'shilpakar' granth vachala tevha vatle aapan yanchi bhet gheu ya. Jevha tyana pratyaksh bhetle ani mag tyanche pravachan aikle tevha malahi asech vatle ki, Parameshwarane khas mazyasathi ase Shri. Satguru uplabdh karun dile aahet.
Tumhala zaleya ya aanandaat amhi sahabhagi aahot. Tumchyakadun khup vp hovo, Satguru-kary-seva hovo hi Shri. Satguru charani prarthana.
Vitthal Vitthal........ Jay Satguru Jay Jeevanvidya
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Sarve Sukhinha santu! Sarve bhadrani pashyantu! May Divinity Within All get bloomed! May God Bless all!
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Deepak_jvm
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« Reply #6 on: September 25, 2007, 07:32:17 PM » |
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Dear Rakeshjee, Namaskar. Getting Satguru or not getting it though very near to you depends on your "Papa" or "Punya". By all your actions you activated your "Punya" to get Satguru. You need plenty of "Punya" to have "Satguru". You got Satguru because of your mental efforts. Your strong desire to get Satguru played an important role. There are many people in this world who are dependent on "Prarabdha" They are not taking any efforts to reach Satguru. My post was for such people.
After getting Satguru, under his guidance things become easy. Instead of leaving everything for "Prarabdha to decide, Satguru advocates "Prayatnawad".
There is tremendous power in thoughts. Satguru has explained power of thoughts in various books.
May God bless all. Deepak
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shambhagwat
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« Reply #7 on: September 29, 2007, 09:11:16 AM » |
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नमस्कार राकेशजी,
आपका अनुभव पढते समय मेरे आँखोंमें पानी भरने लगा. आगे तो आँसू पोछे बिना पढना मुश्कील हो गया! पूरा पढने के बाद मैं ५ मिनिट तक सुनसान बैठा रहा। बस मेरा इतनाही अभिप्राय आपके लिए काफी हैं।
मुझे ऐसे लगता हैं की, आपको हम नही सिर्फ सद्गुरू मार्गदर्शन कर सकते हैं, क्योंकी मैं समझता हूँ की आपने पिछले जनम के कडे प्रयास यह जनममेंभी जारी रखे हैं।
सभीको नमस्कार और बधाई शाम भागवत
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rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« Reply #8 on: September 29, 2007, 04:06:14 PM » |
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आदरनीय शाम भागवतज़ी सादरनमस्कार ,आपकी पोस्ट को समझने का मैं पिछले ४ घंटे से प्रयास कर रहा हूँ | आपकी अन्य भी पोस्ट पड़ने का सौभाग्य मुझे मिला है ,जहाँ तक मेरा अनुमान है आप काफी नपे -तुले शब्दों का प्रयोग कर अपने बहूमुल्यविचारों से अवगत कराते हैं | में आपसे बहुत कुछ सीखना चाहता हूँ यह में अपने अन्तर मन से लिख रहा हूँ -- मुझे अपने मार्गदर्शन से वंचित न करें साथ ही अन्य को भी मार्गदर्शन देने हेतु प्रेरित करें यही मेरी आपसे प्रार्थना है |क्रपया आप अपने निम्न वाक्य को स्पष्ट कर मुझे अनुग्रहित करें मुझे ऐसे लगता हैं की, आपको हम नही सिर्फ सद्गुरू मार्गदर्शन कर सकते हैं, ईश्वरसे यही प्रार्थना हे किवह सभी को सुखी करे राकेश महाशब्दे
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shambhagwat
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« Reply #9 on: September 29, 2007, 04:47:27 PM » |
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नमस्कार राकेशजी,
मेरा कहनेका मतलब बिलकुल साफ हैं। आपने जो लिखा हैं वो पढकर मुझे बहुत खुशी हुई और आपकी निष्ठा (यानेकी दृठ भावना) जानकर बहुत आनंदित हुआ. उसी आनंदके कारण मेरे आँखोंसे आँसू (आनंदाश्रू = बहोत आनंद होने के कारण भी आँखोंमें आँसू आते हैं।) आने लगे। आपकी योग्यताको पहचानकर मैने आपको कहा की, यदि आपको मार्गदर्शन की जरूरी पडे तो आप आवश्य सद्गुरूके पास ही जाया करें। इस जनम के और पिछले जनम के आपके संस्कार जानना और उसीके अनुसार आपको मार्गदर्शन करना सिर्फ सद्गुरूही जानते हैं। (शाब्दे परे च निष्णात) आप अनुग्रह ले। उसके बाद न आपको शक होगा, न कोई आपत्ती।
आपको प्रणाम
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Deepak_jvm
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« Reply #10 on: September 29, 2007, 09:33:47 PM » |
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Dear Mr Bhagwat, Congratulations on your 200th post. Now you have become ultimate contributor!
Wish you all the best in your sadhana,
May God bless all,
Deepak
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dr.nutanpol
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« Reply #11 on: October 04, 2007, 02:58:28 AM » |
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आदरणीय श्री. शाम भागवत,
बाहेर गावाहून आल्यावर आपली अनेक सुंदर e-mails पाहिली. खूप छान वाटले. आपण आता ultimate contributor झालात. Congratulations!
तुमची उत्तरोत्तर आध्यात्मेक प्रगती होवो आणि उत्तम आरोग्य लाभो ही श्री. सदगुरू चरणी प्रार्थना.
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Sarve Sukhinha santu! Sarve bhadrani pashyantu! May Divinity Within All get bloomed! May God Bless all!
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