rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« on: September 25, 2008, 10:11:37 PM » |
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सदगुरु को मेरा सादर प्रणाम ,
विश्व-प्रार्थना का प्रयोजन किसलिए यह सदगुरु ने संकल्प सिधिचे गुपित इस मराठी ग्रन्थ मैं बहुत ही अच्छी तरह व सरलता से समझाया है , इसका लाभ हिन्दी भाषी लोगो को भी हो इसी का प्रयास किया है | हिन्दी अनुवाद करने मैं हुई गलतियों को क्षमा कर , गलतियों को अवश्य इंगित करें ] संसार का प्रत्येक मनुष्य जीवनभर सुख प्राप्ती हेतु भाग-दोड़ करता है | प्रत्यक्ष मैं कुछ अपवाद छोड़ दे तो मनुष्य को सुख मिलने की जगह उसके पास दुख ही आता है , प्रयत्न करने पर भी सुख मिलता नही और दुःख: टालने का प्रयत्न करने पर भी दुःख ही पास आता है | कोलंबस हिंदुस्तान की खोज करने हेतु निकला था उसने इस हेतु भागीरथ प्रयत्न भी किए , परन्तु प्रतक्ष्य मैं वो केवल पहुँचा अन्तिम रूप से अमेरिका ही , इसी प्रकार मनुष्य की भी हालत है | भागीरथ प्रयत्न करने पर भी मनुष्य सुख के प्रदेश मैं पहुचने के बदले वो पहुँचता है दुख के प्रदेश मैं | प्राचीन समय से ये प्रकार इस अनुसार हो रहा है और ये इस प्रकार होता रहेगा , एसा मनुष्य मानकर चल रहा है ,परन्तु सुख ना मिलने का कारण खोजने का प्रयत्न किसी ने कीया यह दिखता भी नही है और जो कुछ भी तथाकथित प्रयत्न हुए भी तो ग़लत दिशा से तथा अभी भी ग़लत दिशा से हो रहे है | जिस प्रकार जमीनपर गिरा हुआ पारा हाथ को लगता तो है पर हाथ मैं आता नही , हमारी छाया हमारे सामने होती है पर हम पकड़ नही पाते, अथवा कुछ दूरी पर सामने आकाश दिखता तो है पर उस तक पहुँचने का प्रयत्न करने पर भी हम आकाश तक पहुँच नही पाते ,उसी प्रकार सुख आज नही तो कल मिलेगा इस आशा से जीवन जगने वाले मनुष्य को अन्तिम समय तक सुख नही मिलता | इसका मुख्य कारण खोजने का प्रयास जीवन-विद्या ने किया है | एक सिधान्त है " ज्ञान देने से ज्ञान बढता है ,सुख देने से सुख बड़ता है और दुःख देने से दुःख बढता है | " इस सिधान्त को थोड़े मैं यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है | आनंद स्वरूप , जाणीवरूप, दिव्य चेतन्यशक्ति अर्थात परमेश्वर | यह परमेश्वर सभी भूतमात्र मैं जेसे वास करता है वेसे ही वो प्रत्येक के शरीर मैं भी ईश्वर रूप से वास करता है | ये ईश्वर सत्चिदानन्द स्वरूप मैं तो है ही उसी का "शरीर" ये व्यक्त और स्थूल रूप है | ऐसा यह दिव्य शरीर ये आनंद का सागर है व उसमे मैं कहने वाला मैं ये आनंद तरंग है | इस आनंद को स्वानंद ऐसा कहते है | इसका भावार्थ यह है कि जो स्वानंद आपका स्वरूप ही है उसको प्राप्त करना मुर्खता का लक्षण है | इसलिए जीवन विद्या ने एक महत्व का सिधान्त बताया है -- " आनंद बाटते-बाटते आनंद लूटने के लिए ही मनुष्य का जन्म हुआ है , इस सत्य को जानकर जीवन जगना ही सच्ची समझदारी है | पहले आनंद दो फिर आनंद लूटो , पहले सुख दो फिर सुख लो , यह निसर्ग या प्रकृति का नियम है | १- जेसाभाव वेसा भगवान 2- जेसा करोगे वेसा भरोगे ३- जेसा कर्म वेसा फल ४- जेसा बोगे वेसा उगेगा ५-जेसी क्रिया वेसी प्रतिक्रिया | इस संदर्भ मैं महाराष्ट्र के संत नामदेव महाराज ने भगवान को उदेश्य मैं रखकर मराठी मैं कहा है --" घेसी तेंव्हा देसी ऐसा अससी उदार |" इसका भावार्थ एकदम स्पष्ट है कि भगवान से प्राप्त करने हेतु पहले भगवान को देना पड़ता है | तात्पर्य , आनंद अथवा सुख प्राप्त करने हेतु पहले ये आपको दूसरों को देना चाहिए ,परन्तु यहाँ एक प्रमुख अडचन निर्माण होती है कि , मनुष्य को उसके ह्रदय मैं आनन्दसागर है इसका ही ज्ञान नही है , इसी प्रकार से उसके पास जो स्वानंद है वो दूसरो को देना पड़ता है यही उसे मालूम नही इस कारण दूसरो को स्वानंद देने का मार्ग कोनसा यह भी उसे मालूम नही, परन्तु यह जो अडचन है इसको मत देना संभव है | बिजली के बारे मैं मनुष्य को पूर्ण अज्ञान होने के बावजूद वो बिजली के उपकरणों के द्वारा बिजली का उपयोग स्वयं हेतु कर सकता है उसी प्रकार ह्रदय मैं स्थित स्वानंद के सागर के बारे मैं अज्ञान होने के बावजूद वो दूसरों को स्वानंद विशिष्ट प्रकार से बाँट सकता है | अपने ही पास जो स्वानंद है उसे दूसरो को देने का मार्ग एक ही है वो है " शुभ विचार करो ,शुभ इच्छा करो ,शुभ बोलो व शुभ कर्म करो |" विचारों के माध्यम से ही हम धीरे धीरे आचरण तक जाते है | " mind moves from thought to thing " इस महत्वपूर्ण सिधान्त को ध्यान मैं रखना अत्यन्त आवश्यक है | विचारों का ही परिवर्तन उच्चार व आचार मैं होता है इस लिए शुभ विचार करना यही सबसे महत्वपूर्ण है | शुभ विचार करना अर्थात प्रतक्ष्य मैं सुन्दर विचारों का बहिर्मन द्वारा अंतर्मन मैं रोपण करना होता है | बहिर्मन मैं हमेशा शुभविचार करने से शुभ विचार अंतर्मन मैं जाते है वहां ठहरते हैं और जड़ पकड़ते है वहीँ से स्फुरित होते हैं और जीवन मैं साकार होते हैं | इस सन्दर्भ मैं नेपोलियन हिल ने कहा है-- " positive thinking sets in motion positive forces which bring positive resultsto pass. " दुसरे शब्दों मैं समझें तो -" निरंतर शुभ विचार करने से मनुष्य के अंतर्मन की बनावट बदलती है , उसका परिवर्तन होता है ,और उसकी मानसिकता भी पूर्ण रूपेण बदलती है इस प्रकार बदली हुई मानसिकता वाला मनुष्य स्वयं सुखी होकर दूसरो को भी सुखी करने मैं जाने-अनजाने मैं प्रतक्ष्य या अप्रतक्ष्य रूप से कारणीभूत होता है या उनके सुखी होने का कारण बनता है ,दूसरा विषय यह कि, ये विश्व प्रार्थना गरीबों को वरदान ,अमीरों का आधार व विश्व को उपयुक्त होकर ये धर्मातीत ,वैश्विक व शाश्वत है | यह विश्व प्रार्थना गरीबों को अक्षरश वरदान है क्योंकि उन्हें किसी का भी आधार नही होता | भगवान गरीबों का पालनहार है ऐसा सभी कहते है परन्तु प्रतक्ष्य मैं गरीबों को ऐसा अनुभव आता नही है , परन्तु यह विश्व प्रार्थना गरीबों की पालनहार होकर उन्हें मिला हुआ एक भरी-भरकम आधार है | अनेक छेदों वाले बर्तन मैं कितना भी पानी भरों वो खाली ही रहेगा| उसी प्रकार गरीबों के संसार रुपी बर्तन मैं अनेक छेद होते है इन्हे निम्न प्रकार से बताया जा सकता है ------ १-- - शराब, गुटखा,तम्बाखू आदि व्यसन \ २-- इन व्यसनों के कारण स्वास्थ्य१ खराब परिणाम स्वरूप डाक्टर का व्यय ३-- अमर्यादित संतति ४--- अधिक संतानों के जन्म स्वरूप स्त्रियाँ कमजोर ,बीमार अर्थात डाक्टर व दवाइयों का भयंकर खर्च ५-- अधिक संतानों के फल स्वरूप उनके लालन पालन मैं अधिक खर्च व लालन-पालन भी ठीक नही व शिक्षा का अभाव ६-- गरीबी व अशिक्षा के कारण कष्ट के प्रसंग अधिक व उनके निराकरण हेतु बाबा ,भगत ,फकीर या अन्य ढोंगी महात्माओं के पास जाकरअनावश्यक खर्च | ७-- कष्टप्रद स्थिति के कारण भविष्य की आशा की किरण हेतु भविष्यवक्ताओं पर अनावश्यक खर्च संसार रुपी बर्तन मैं इन सात बड़े बड़े छेदों के कारण कितना भी पैसा मिला वह अपूर्ण ही रहेगा ,यह बताने के लिए किसी ज्योतिषी की जरूरत नही है | ये जो सात बड़े बड़े छेद है इन्हे बंद करने का कार्य जीवन विद्या मिशन करता है |जीवनविद्या मिशन मैं आए नामधारकों को जीवनविद्या का ज्ञान मिलता है ,अच्छी संगत मिलती है ,विश्व प्रार्थना गायन की आदत लगती है व उनकी विचार करने की विधि मै परिवर्तन होता है | खाली समय मैं निरंतर विश्व प्रार्थना करने से व अच्छे लोगों की संगती से नामधारकोंकी अंधश्रधा नष्ट होती है , मर्यादित संतती के मह्त्व का ज्ञान होता है , निरोगी रहते है ,बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण करने लगते है ,अनिष्ट व्यसनों से छुटकारा मिलता है परिणाम स्वरूप उनकी साम्पतिक स्थिति सुधरती है व जीवन प्रगतिशील होता है | विश्व प्रार्थना जिस प्रकार से गरीबों को उपयोगी है उसी प्रकार से धनवानों को भी आधार होती है | गरीबी के कारण गरीबों के दुःख अलग होते है और धनवान होने के कारण धनवानों के दुःख अलग होते है | धनवान होने के लिए ,पैसा प्राप्त करने के लिए ,सम्पत्ति बदने के लिए उन्होंने जो व्यापार बढाया होता है इसके फल स्वरूप चिंता ,डर ,क्रोध आदि बातों से वे घिर जाते है , परिणाम स्वरूप वे जीवन मैं बडी खीचं-तान मैं उलझ जाते है | इस प्रकार की झंझटभरी,खींच-तान भरी जिन्दगी से छुटकारा पाने हेतु विश्व प्रार्थना रामबाण उपाय है | खाली समय मैं विश्व प्रार्थना करने की आदत यदि इन धनवान लोगों को लग जाए तो इन्हे भारी मात्रा मैं मन संताप आदि बातों से मुक्ति मिलेगी और उन्हें मन शान्ति प्राप्त होगी यह निशित है | विश्वप्रार्थना ही विश्व को अर्थात विश्व मानवजाती को उपयुक्त सिद्ध हो सकती है | विश्व प्रार्थना ये धर्मातीत है ,वैश्विक है और शाश्वत है | यह धर्मातीत है अर्थात यह सभी धर्म के लोगों हेतु है |यह शाश्वत है अर्थात यह निसर्ग नियमों पर अधिष्ठित है और यह वैश्विक है अर्थात यह विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए उपयुक्त है | संसार के प्रत्येक व्यक्ति को, सुखी जीवन प्राप्त हो ऐसी इच्छा होती है ,परन्तु यह इच्छा किस प्रकार पूर्ण करनी चाहिए इसका अचूक मार्ग ज्ञात नही होता है | लोगों के इसी अज्ञान का धूर्त और पाखंडी मनुष्य फायदा उठाते है व उनको गलत मार्ग दर्शन करके स्वयं की रोटी पर घी चुपड़ते है |लोंगो की अंध-श्रधा को ,उनके अज्ञान को धर्म ,जाती ,पंथ,वंश आदि नामो मै खाद-पानी डाल कर ये धूर्त व पाखंडी लोग जनता मैं परस्पर दूरी व द्वेष निर्माण करते है और इसका भरपूर लाभ स्वयं हेतु उठाते है | जीवनविद्या ने केवल सुखी होने की मास्टर चाबी लोगों के हाथों मैं दी है | यह मास्टर चाबी अर्थात-- "तुम दूसरो को जो सुख दोगे वही सुख बूमरेंग होकर तुम पर सुख की वर्षा करेगा |"दूसरो को सुखी करने का अत्यन्त सीधा -सरल मार्ग अर्थात विश्व-प्रार्थना का जप करना | "क्रिया वेसी प्रतिक्रिया" इस निसर्ग नियमानुसार विश्व-प्रार्थना करने से मनुष्य की मानसिकता मैं परिवर्तन होता है ,उसके दूसरो से संबंध सुधरते है , जीवन की ओर देखने की द्रष्टि बदलती है ,परिणाम स्वरूप वह स्वयं सुखी होकर दूसरो को यथाशक्ति सुखी करने का प्रयत्न करता है | सुंदर विचारों से परिपूर्ण व ओतप्रोत विश्व-प्रार्थना का प्रयोजन यही है |
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