rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde
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« on: September 26, 2008, 05:34:33 PM » |
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सर्व प्रथम सदगुरु को मेरा नमन
एक विचार प्रत्येक मनुष्य के मन मैं निरंतर बना रहता है कि मैं सुखी रहूँ | इस हेतु प्रत्येक मनुष्य प्रयत्नशील रहता है | एक विद्यार्थी हो या ग्रहस्थ , बालक हो या बुजुर्ग -प्रत्येक के सामने एक ही उदयेश हिया येन केन प्रकारेण सुखी बनना | मनुष्य को एक बहुत बड़ा भ्रम है कि सुखी बनने का एक ही ब्रह्मास्त्र है पैसा , जितना पैसा होगा उतना हम सुखी होंगे ,दुःख हमसे दूर होंगे | दुनिया मैं दुःख का मूल कारण है पैसा और कुछ नही, परन्तु सुख की अभिलाषा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुख की परिभाषा भी नही मालूम | आप किसी से भी पूछे सुख याने क्या ? --कई तत्वों मैं से सबसे पहले पैसा ही आता है | इसके बाद उसके मन मैं विचार आता है कि पैसा तो है पर घर मैं शान्ती नही तो क्या वह सुखी रहेगा , तब वह कहेगा कि घर मैं शान्ती होना चाहिए | घर कि शान्ती हेतु वर्तमान मैं मनुष्य सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानता है घर कि या परिवार कि स्त्री वर्ग को | कई उक्तियाँ सुनाने को उत्सुक रहेगा ,पुरूष वर्ग शान्ती हेतु केवल स्त्रियों को ही सर्वाधिक जिम्मेदार मानता है , यदि आप किसी महिला से यह प्रश्न करें तो वह शान्ती हेतु परिवार केपुरुष वर्ग को कुछ हद तक जिम्मेदार मानती है,साथ ही यदि परिवार मैं अन्य महिलाये भी हो तो उनको भी कुछ हद तक दोषी मानने मैं उन्हें हिचक या संदेह नही होता इन सबके बाद पति -पत्नी दोनों मिलकर शान्ती हेतु कुछ हद तक बच्चों पर भी वैचारिक प्रहार करने से नही चुकते यह तो हुई शान्ती कि बात | अब तीसरी बात सुखी रहने हेतु प्रभावी मानी जाती है वह है स्वयम कि मह्त्वाकांशाये | मह्त्वाकांशाये पूर्ण नही हो रही है तो भी मनुष्य पूर्ण न होने के पीछे कारणों मैं वह अन्य के दोष ढूडना प्रारम्भ करता है | इसके पश्चात प्रत्येक मनुष्य एक दो नही ८- १० कारण अपनी -अपनी परिस्थिति अनुसार गिना देता है | ऊपर वर्णित विचारों के भावार्थ मैं हमें यह देखने मिलता है कि प्रत्येक मनुष्य चाहे वह पुरूष हो या महिला स्वयं को कहीं भी दोषी नही समझते | अब इन विचारों पर ध्यान दें सच्चे मन से ( मन मैं किसी भी प्रकार का भेदभाव लाये बिना ) तो हमें यह देखने मैं आता है कि हमारी स्वयं कि सुख कि परिभाषा जो है वही दोषी है जो भी परिभाषा हमारे मन मैं बेठी है वह केवल स्वयं के विवेक से निर्धारित परिभाषा है |इस हेतु हमने कभी प्रयत्न नही किया कि सुख का सही अर्थ जाने | थोड़ा बहुत सुख को जानने हेतु आगे बड़े तो हम विविध प्रकार कि बैटन मैं उलझ जाते है जेसे - हमें यह कर्म कांड करना चाहिए ,भाग्य मैं सुख है या नही ,या ग्रह दशा ठीक नही चल रही है, सुख याने मोक्ष आदि -आदि |हम थोड़ा बहुत स्वयं को वैचारिक शक्ति वाला मनुष्य समझते है तो आधे -अधूरे ज्ञान को ही पूर्ण मानकर ,उसके अनुसार कही की बात कहीं जोड़कर तर्क करने लगते है व इसी तरह सुखी बनने के चक्कर मैं दुखमय जीवन व्यतीत करते रहते है -धीरे धीरे क्षणिक आनंद या खुशी पाने हेतु हम तरह तरह के मनोरंजन के साधनों की और जाते है , विभिन्न प्रकार के समाज मैं व्याप्त साधनों की और भागने लगते है -- पर यही सुख है यह भी हम मानने को तैयार नही | किसी भी साधन या किसी भी क्षेत्र की मर्यादाएं होती है यह जानने की हम आवश्यकता ही महसूस नही करते | संक्षेप मैं निष्कर्ष यही प्रतीत हो रहा है कि-- यदि हम सच्चे मन से यह सोचें कि बहुत हो गया सुख कि खोज मैं भटकते-- भटकते अब नही भटकना अब हमें सच्चे सुख को प्राप्त करना ही है तो सर्व प्रथम हमें ---- १---- अपने विचारों मैं शुद्धता लानी होगी |इस हेतु सबसे सस्ती,आसान व सुलभ प्रक्रिया अर्थात जीवनविद्या मिशन कि विश्व -प्रार्थना निरंतर स्मरण करें विचारों मैं शुद्धता अवश्य आएगी | २ -- द्वितीय कार्य मैं हमें यह सच्चे मन से जानने का प्रयास करना है कि सच्चा सुख क्या ? यह जानकर हमें अपने विचारों को प्रभावी बनाना है व इस पर सतत चिंतन करना है इस प्रक्रिया मैं भी अधिक समय नही लगेगा ,यदि हमसच्चे मन से प्रयास करेंगे तो हमें मात्र कुछ माह मैं ही इसके परिणाम महसूस होने लगेंगे , हमें केवल जीवनविद्या मिशन कि पुस्तकों को पड़कर मनन करना है | ३--- तीसरा कार्य आपको उपरोक्त दोनों प्रक्रिया प्रारम्भ करने के कुछ माह बाद ही समझ मैं आ जाएगा और जब वह समझ मैं आजाये तो उस पर कार्य करना ही हमारे सुखी जीवन के मार्ग को प्रशस्त करना होगा आप दो बाते हमेशा ध्यान रखे --- १ -- तुम ही हो अपने जीवन के शिल्पकार २ - जेसे तुम्हारे विचार होंगे वेसा ही जीवन आकार लेगा |
जो कार्य आप आज तक नही करपाए वह अब करें,-- कुछ माह मैं ही आप स्वयं महसूस करेंगे कि आपका जीवन सुख कि और अग्रसर है |
इति शुभम
सदगुरु कृपा से सभी को सुखी जीवन प्राप्त हो | राकेश महाशब्दे
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