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Author Topic: हम विश्व प्रार्थना क्यों करें ?  (Read 2040 times)
rakeshmahashabde
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rakesh mahashabde


« on: September 27, 2008, 09:30:13 PM »


   सदगुरु को मेरा चरण वन्दन  व सभी को  मेरा नमस्कार ,

       मनुष्य विचार करने वाला प्राणी है | जीवन जीते हुए उसके मन मैं असंख्य विचार आते- जाते है | सर्वसधारण मनुष्य को , अपने मन मैं असंख्य विचार आते- जाते है इसका ही पता नही रहता | इन विचारों मैं बहुधा अनिष्ट स्वरूप के विचार होते है | ये अनिष्ट स्वरूप के विचार मनुष्य के जीवन मैं अनिष्ट का निर्माण करते है | सबसे बड़ी बात तो यह है की वह अनिष्ट विचार कर रहा है इससे वह पूर्ण रूप से अनभिज्ञ होता है, परिणाम स्वरूप " जेसे विचार वेसा जीवन को आकार "  अथवा " As you think so you become "इस निसर्ग के नियम अनुसार मनुष्य को अनिष्ट प्रसंगों का सामना करना पड़ता है | जाने या अनजाने मैं जहर लिया तो भी उसका परिणाम हमें भुगतना ही पडेगा | इस सन्दर्भ में डाक्टर मर्फी कहते है कि-" Thoughts of jealousy, fear, worry, and anxiety tear down and destroy your  nerves and  glands bringing  about mental  and physical diseases  of all kinds ."  दूसरा विषय ऐसा है कि , मनुष्य का विचार करने वाला मन घड़ी के पेंडुलम जेसा होता है | घडी का पेंडुलम  एक सिरे से दूसरे सिरे तक व दूसरे सिरे से पहले सिरे तक डोलता रहता है ठीक इसी प्रकार "-- मनुष्य का मन भूतकाल से भविष्यकाल कि ओर व  भविष्यकाल से  भूतकाल की ओर " इस रीती से हमेशा फिरता रहता है | भूतकाल में घटित अनिष्ट बातों का चिंतन व भविष्य में क्या होगा इसकी चिंता , -- इस रीती से मनुष्य चिंता व चिंतन करता रहता है | कोयला जितना भी घिसोगे उतना ही काला होता जाएगा , उसी प्रकार  भूतकाल में घटित अनिष्ट बातों का चिंतन व भविष्य में क्या होगा इसकी चिंता ,करने से मनुष्य की परिस्थिति दिन पर दिन बिगडती व दयनीय होती जाती है |  वर्तमान  काल मैं ईश्वर पर मन को स्थिर रखना मनुष्य को जमता नही है , परन्तु नित्य विश्व- प्रार्थना करने से, मनुष्य के मन में आने वाले विचार धीरे धीरे कम होने लगते है , धीरे धीरे विश्व- प्रार्थना की ओर  उसका मन खिचंता जाता है ,प्रार्थना की मिठास अनुभव होती है ओर परिणाम स्वरूप मनुष्य का मन विश्व प्रार्थना में रमता व रंगता जाता है | नामस्मरण या विश्व प्रार्थना के बल पर मनुष्य को वर्तमान काल मैं ईश्वर पर  मन स्थिर करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है  "चलते चलते मनुष्य अपने गंतव्य को पहुंच जाता है उसी प्रकार विश्व प्रार्थना करते करते साधक ईश्वर के चरणों मैं लीन होता है |"
               
  विश्वप्रार्थना निरंतर करते रहने से बहिर्मन द्वारा अंतर्मन के कम्प्यूटर को निरंतर सुंदर विचारों की feeding मिलने से अंतर्मन का पेटर्न बदलता है | विश्वप्रार्थना के द्वारा शुभ चिन्तन होते रहने से बहिर्मन का शुद्धि करन होकर अंतर्मन का उन्नयन होता है परिणाम स्वरूप अंतर्मन का रूपान्तर दिव्यता के आभास  में होने लगता है |
      दूसरी बात यह की नित्य विश्वप्रार्थना करते करते साधक को अन्य लोगों के प्रति अपनेपन की भावना जाग्रत होने लगती है , सबका कल्याण हो , सबका भला हो ऐसा उसको मन से लगने लगता है | सारांश में मनुष्य के जीवन में परिवर्तन लाने  की क्षमता इस विश्वप्रार्थना में है , इसलिए मनुष्य को विश्वप्रार्थना करनी  चाहिए  |
            सन्दर्भ -- संकल्प सिद्धि चे गुपित                               ----------------------------
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Vaibhav Nimbalkar
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Viththal Viththal...


« Reply #1 on: November 26, 2008, 03:17:25 AM »

नमस्कार राकेशजी! Smiley
आपने बडी अभ्यासपूर्ण पद्धतीसे हमें इस विषय के अनुरोध में बहुमूल्य ज्ञान हिंदीमें देने के कष्ट उठाये l इस लिये हम सब आपका तहें दिलसे शुक्रिया अदा करते हैं l
अब तक आपके इस 'topic' को २७० से अधिक वाचकोंने पढा हुआ हैं इसिमे आपकी बेहद् सफलता एवं हम सबकी कृतज्ञता समाविष्ट हैं l भविष्यमें आपसे इसही तरह के और विचारोंके विवेचनकी अपेक्षा करता हूं l
धन्यवाद !
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May GOD bless all...Cheesy
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